200 करोड़ खर्च करके भी नहीं कर पाया कोई इंजीनियर, पांचवी पास ने ‘फ्री’ में करके दिखाया

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ज्ञान डिग्रीयों के लिए मोहताज नहीं| जी हाँ यदि आपके पास ज्ञान हैं तो उसके लिए किसी डिग्री का आवश्यकता नहीं हैं| जैसे कुछ कार्य ऐसे होते हैं जो बड़े-बड़े इंजीनियर नहीं कर पाते हैं लेकिन उसी काम को एक छोटा-मोटा मकैनिक कर दिखाता हैं| ऐसे ही नालो के पानी को 200 करोड़ रुपये लगाकर भी बड़े-बड़े इंजीनियर नहीं कर पाये, उस पानी को एक कम पढ़ें इंसान ने मुफ्त में पीने लायक बना कर दिखा दिया| इतना ही नहीं उस शख्स ने बिजली बनाने का तरीका भी ढूंढ निकाला| इसके बावजूद उस शख्स को इस खोज के लिए नगर निकाय मे कोई तवज्जो नहीं दिया|

गांवो में घूमकर शौचालय बनाने वाले गुमानपुरा निवासी नीरज तिवारी ने बायो सीवरेज ट्रीटमेंट एंड इलेक्ट्रिसिटी जनरेशन प्लांट की तकनीक विकसित की हैं। वेस्टेज से बनाये गये इस प्लांट में सीवरेज को साफ करने के लिए ओपन टनल बनाई गई है। इसे हिस्सो में बाटा गया हैं और टनल के मुख्य द्वार को नाले से जोड़ा गया है। इस प्लांट के सभी टनल में 5-5 एनीकट बनाए गए हैं। पहले एनीकट में लाइम स्टोन, दूसरे में रथकांकर स्टोन, तीसरे में चारकोल, चौथे में ईंटों के टुकड़े और पांचवें में मिक्स मटेरियल के साथ-साथ फिटकरी डाली गयी हैं।

नाले के पानी के साथ बहकर आये कचरे को साफ करने के लिए इन सभी एनीकट के बीच में फिल्टर लगाए गए हैं। इस प्लांट में पहली टनल से पानी फिल्टर होता हैं इसके बाद एक टैंक में गिराया जाता है, ताकि बारीक गाद नीचे बैठ सके। अब गाद और कीचड़ का स्तर नापने के लिए इस प्लांट में मीटर भी लगाया गया है और यह टैंक दूसरी टनल से जुड़ा है। इसमें लंबे एनीकट बनाए गए हैं। इससे गुजरने के बाद पानी दूसरे टैंक में गिरता है, फिर तीसरी टनल में जाता है और इस टनल में पानी में उपस्थित वैक्टीरिया को नष्ट करने के लिए नीम, पौधों के जाइलम और स्लोयम टिश्यूज डालकर उसे फिल्टर किया गया है और अंतिम में बने एक टैंक में साफ पानी को स्टोर किया जाता हैं|

जलदाय विभाग ने जब साफ पानी के नमूनों की जांच करवाई तो सीवरेज में पाए जाने वाले सभी हानिकारक तत्व नष्ट हो चुके थे| लेकिन इस पानी में पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन नहीं थी और पीने के पानी में ऑक्सीजन होना जरूरी हैं| जब नीरज ने जल विभाग के अभियंताओं से इस खामी को दूर करने का तरीका पूछा तो उन्होंने साफ हो चुके पानी को लिफ्ट करके ऊंची टंकी में स्टोर करने और उसके बाद वहां से नीचे गिराने का सुझाव दिया।

नीरज जी ने नगर निगम, नगर विकास न्यास, जिला प्रशासन और राज्य सरकार व केंद्र सरकार के मंत्रालयों में भी प्रजेंटेशन दिए, लेकिन उन्हें इस खोज के लिए कोई तवज्जो नहीं मिला। जब वो जिला उद्योग केंद्र महाप्रबंधक से मिले तो उन्होंने ना सिर्फ नीरज के इस खोज की सराहना की, बल्कि कोटा के 14 बड़े औद्योगिक संस्थानों को सीएसआर स्कीम के तहत इस प्लांट को लगाने के लिए भी कहाँ हैं। हालांकि किसी भी संस्थान ने इस प्लांट को अभी तक स्थापित नहीं कराया हैं।

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